Tata Steel COG Injection Project : ओडिशा के मेरामांडली प्लांट में ब्लास्ट फर्नेस-1 में कोक ओवन गैस इंजेक्शन तकनीक की शुरुआत, कोयले की खपत और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में बड़ी पहल।
Tata Steel COG Injection Project : टाटा स्टील ने ओडिशा के मेरामांडली प्लांट में देश का पहला कोक ओवन गैस (COG) इंजेक्शन प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक शुरू किया है। इस तकनीक के जरिए स्टील निर्माण में इस्तेमाल होने वाले जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने की कोशिश की जा रही है। कंपनी के मुताबिक यह पहल 2045 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
कल्पना कीजिए, जिस गैस को अब तक स्टील प्लांट में अक्सर अतिरिक्त गैस के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था या फ्लेयर के जरिए जला दिया जाता था, वही गैस अब लोहे के निर्माण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। टाटा स्टील ने स्टील उद्योग में ऊर्जा दक्षता और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहल की है।
कंपनी ने ओडिशा स्थित मेरामांडली स्टील प्लांट के ब्लास्ट फर्नेस-1 में देश का पहला कोक ओवन गैस (COG) इंजेक्शन प्रोजेक्ट सफलतापूर्वक शुरू किया है। इस परियोजना को भारतीय इस्पात उद्योग में एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है।
इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य स्टील उत्पादन के दौरान इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक जीवाश्म ईंधन की आवश्यकता को कम करना और उपलब्ध गैस संसाधनों का अधिक प्रभावी तरीके से उपयोग करना है।
COG यानी Coke Oven Gas यानी कोक ओवन गैस। स्टील निर्माण की प्रक्रिया में कोयले को कोक में बदलने के दौरान इस तरह की गैस उत्पन्न होती है। इसमें हाइड्रोजन और कई तरह के हाइड्रोकार्बन मौजूद होते हैं।
अब तक इस गैस का इस्तेमाल मुख्य रूप से ऊर्जा उत्पादन जैसे विभिन्न कामों में किया जाता रहा है। कुछ परिस्थितियों में अतिरिक्त गैस को फ्लेयरिंग के माध्यम से जला दिया जाता है। टाटा स्टील ने इसी गैस को स्टील निर्माण की मुख्य प्रक्रिया में इस्तेमाल करने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
नई तकनीक के तहत COG को सीधे ब्लास्ट फर्नेस के ट्यूयर्स (Tuyeres) में इंजेक्ट किया जाएगा। इसका उद्देश्य ब्लास्ट फर्नेस में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक ईंधन की आवश्यकता को कम करना है।
ब्लास्ट फर्नेस स्टील निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण इकाइयों में से एक है। इसमें लौह अयस्क को उच्च तापमान पर प्रोसेस करके पिघला हुआ लोहा तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होती है और पारंपरिक तौर पर कोक का इस्तेमाल किया जाता है।
कोक आधारित प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन भी महत्वपूर्ण चुनौती है। ऐसे में यदि किसी वैकल्पिक गैस का इस्तेमाल करके कोक की आवश्यकता कम की जा सके, तो इससे उत्पादन प्रक्रिया के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में मदद मिल सकती है।
COG में मौजूद हाइड्रोजन और हाइड्रोकार्बन ब्लास्ट फर्नेस की रासायनिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं। कंपनी का प्रयास है कि इसके जरिए कोक की खपत कम हो और गैस के उपलब्ध संसाधन का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके।
मेरामांडली प्लांट में शुरू की गई इस परियोजना को तकनीकी रूप से विकसित करने में वैश्विक विशेषज्ञों का सहयोग लिया गया है। टाटा स्टील ने Paul Wurth-SMS और Kobelco के साथ मिलकर इस तकनीक को लागू किया है।
इस तरह की परियोजना में सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वैकल्पिक ईंधन को मौजूदा ब्लास्ट फर्नेस सिस्टम के साथ सुरक्षित और प्रभावी तरीके से जोड़ा जाए। COG को ब्लास्ट फर्नेस के ट्यूयर्स तक पहुंचाने के लिए विशेष इंजेक्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया गया है।
पायलट प्रोजेक्ट के सफल संचालन के बाद इस तकनीक से भविष्य में बड़े स्तर पर लाभ मिलने की संभावनाएं बढ़ी हैं।
स्टील उद्योग दुनिया के उन औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल है जहां ऊर्जा की खपत और कार्बन उत्सर्जन दोनों काफी अधिक होते हैं। इसलिए स्टील कंपनियां उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ उत्सर्जन कम करने वाली तकनीकों पर भी तेजी से काम कर रही हैं।
टाटा स्टील की COG इंजेक्शन परियोजना इसी दिशा में एक कदम है। कोक की खपत कम होने और उपलब्ध गैस को दोबारा उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल करने से ऊर्जा दक्षता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
कंपनी का व्यापक लक्ष्य 2045 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन की दिशा में आगे बढ़ना है। ऐसे में ब्लास्ट फर्नेस में वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल को कंपनी की लंबी अवधि की डीकार्बोनाइजेशन रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा सकता है।
टाटा स्टील के वाइस प्रेसिडेंट (टेक्नोलॉजी एंड आरएंडडी) सुबोध पांडे के मुताबिक, औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाली गैसों का पुनर्चक्रण कर जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना टिकाऊ विनिर्माण के भविष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने इस तरह की तकनीक को कंपनी के नेट जीरो लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। वहीं, मेरामांडली के वाइस प्रेसिडेंट (ऑपरेशंस) सुधीर कुमार मेहता ने भी इस तकनीक को अधिक किफायती और स्वच्छ उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।
कंपनी का मानना है कि सफल पायलट प्रोजेक्ट के बाद ब्लास्ट फर्नेस को आधुनिक फ्यूल सिस्टम के साथ संचालित करने की दिशा में महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त हुआ है।
भारत दुनिया के प्रमुख स्टील उत्पादक देशों में शामिल है। देश में स्टील की मांग लगातार बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने के साथ पर्यावरणीय प्रभाव को कम करना भी बड़ी चुनौती है।
टाटा स्टील की यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें नई गैस बनाने के बजाय स्टील उत्पादन प्रक्रिया से ही उपलब्ध होने वाली गैस का बेहतर उपयोग किया जा रहा है। यानी एक ऐसी गैस, जिसे पहले सीमित उपयोग के बाद जला दिया जाता था, अब उत्पादन प्रक्रिया में दोबारा इस्तेमाल की जा रही है।
यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो भविष्य में ब्लास्ट फर्नेस आधारित स्टील उत्पादन में ईंधन मिश्रण और ऊर्जा दक्षता को लेकर नए रास्ते खुल सकते हैं।
टाटा स्टील लंबे समय से अपने उत्पादन को अधिक टिकाऊ और ऊर्जा-कुशल बनाने की दिशा में तकनीकी प्रयोग कर रही है। COG इंजेक्शन प्रोजेक्ट भी इसी रणनीति का हिस्सा है।
मेरामांडली में शुरू किया गया यह पायलट प्रोजेक्ट सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि स्टील निर्माण में उपलब्ध संसाधनों के पुनर्चक्रण और कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
आने वाले समय में इस परियोजना से प्राप्त परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि COG इंजेक्शन तकनीक को कितने बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है। अगर इसके अपेक्षित परिणाम मिलते हैं, तो यह तकनीक भारत के साथ-साथ वैश्विक स्टील उद्योग के लिए भी उपयोगी मॉडल बन सकती है।
टाटा स्टील का मेरामांडली में शुरू किया गया देश का पहला COG इंजेक्शन प्रोजेक्ट स्टील निर्माण की पारंपरिक प्रक्रिया में बदलाव की संभावनाओं को दिखाता है। कोक ओवन गैस जैसी उपलब्ध गैस का दोबारा इस्तेमाल करके कंपनी ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने की कोशिश कर रही है।
स्टील उद्योग के लिए यह प्रयोग इसलिए भी अहम है क्योंकि भविष्य की चुनौती केवल अधिक स्टील बनाना नहीं, बल्कि कम कार्बन उत्सर्जन के साथ अधिक स्वच्छ और टिकाऊ स्टील बनाना है। मेरामांडली का यह प्रोजेक्ट इसी बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।


















