Jharkhand High Court : 11वीं-13वीं JPSC और JSSC परीक्षाएं रद्द करने के आदेश पर हाईकोर्ट की रोक, सफल अभ्यर्थियों को बड़ी राहत

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Jharkhand High Court : झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत 11वीं से 13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा समेत कई भर्ती परीक्षाओं को रद्द किया गया था। कोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का हवाला देते हुए सरकार से जवाब तलब किया है।

Jharkhand High Court : झारखंड हाईकोर्ट ने 11वीं-13वीं JPSC और JSSC परीक्षाओं को रद्द करने के राज्य सरकार के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। जानिए कोर्ट की टिप्पणी, अभ्यर्थियों की दलील और आगे क्या होगा।

Jharkhand High Court : रांची से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिसके तहत 11वीं, 12वीं और 13वीं संयुक्त सिविल सेवा (JPSC) तथा कुछ अन्य भर्ती परीक्षाओं को रद्द किया गया था। अदालत ने सफल अभ्यर्थियों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि बिना व्यक्तिगत सुनवाई और पर्याप्त जांच के सभी चयनित उम्मीदवारों के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई करना प्रथम दृष्टया उचित नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट के इस अंतरिम आदेश से उन सैकड़ों अभ्यर्थियों और चयनित अधिकारियों को बड़ी राहत मिली है, जिनकी नियुक्ति सरकार के फैसले के बाद संकट में पड़ गई थी।

हाल ही में झारखंड सरकार ने 11वीं से 13वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा और कुछ अन्य भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय लिया था। सरकार का तर्क था कि भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं, इसलिए पूरी चयन प्रक्रिया को निरस्त करना आवश्यक है।

सरकार के इस फैसले के बाद चयनित अभ्यर्थियों में भारी असंतोष देखने को मिला। कई उम्मीदवारों ने दावा किया कि उन्होंने पूरी प्रक्रिया ईमानदारी से पूरी की है और बिना किसी व्यक्तिगत दोष के उनकी नियुक्ति रद्द करना न्यायसंगत नहीं है।

सरकार के आदेश के खिलाफ सोनम कुमारी, दीपमाला सहित कई सफल अभ्यर्थियों ने झारखंड हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएँ दायर कीं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की कि सरकार के आदेश को तत्काल प्रभाव से रोका जाए और उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।

याचिका में कहा गया कि सरकार ने किसी भी अभ्यर्थी के खिलाफ व्यक्तिगत जांच नहीं की, न ही कोई नोटिस जारी किया। ऐसे में सभी चयनित उम्मीदवारों को एक साथ दोषी मानकर नियुक्ति समाप्त करना संविधान और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने Natural Justice (प्राकृतिक न्याय) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाला निर्णय लेने से पहले उसे सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।

उन्होंने दलील दी कि यदि किसी भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता हुई भी है, तो उसकी जिम्मेदारी व्यक्तिगत स्तर पर तय होनी चाहिए। केवल प्रक्रिया में शामिल होने के आधार पर सभी सफल अभ्यर्थियों को दंडित नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कई उम्मीदवार वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा में सफल हुए हैं और वे वर्तमान में विभिन्न प्रशासनिक पदों पर कार्यरत भी हैं। ऐसे में बिना सुनवाई के उनकी सेवा समाप्त करना अनुचित होगा।

झारखंड हाईकोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद राज्य सरकार के आदेश पर अंतरिम रोक लगाते हुए मामले की सुनवाई तेज करने का निर्देश दिया है।

अदालत ने संकेत दिया कि प्रथम दृष्टया यह देखना आवश्यक होगा कि क्या सरकार ने निर्णय लेते समय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया था। साथ ही सरकार से इस संबंध में विस्तृत जवाब भी मांगा गया है।

यह आदेश अंतिम फैसला नहीं है, बल्कि तब तक प्रभावी रहेगा जब तक मामले की विस्तृत सुनवाई पूरी नहीं हो जाती।

हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद सबसे बड़ी राहत उन चयनित अधिकारियों को मिली है जिनकी नियुक्ति रद्द होने की आशंका थी। कई अभ्यर्थी वर्तमान में विभिन्न विभागों में योगदान दे रहे हैं और सरकार के आदेश के बाद उनके भविष्य पर सवाल खड़े हो गए थे।

अंतरिम रोक के कारण फिलहाल उनकी नियुक्ति और सेवा पर तत्काल प्रभाव से कोई प्रतिकूल कार्रवाई नहीं होगी। हालांकि अंतिम निर्णय हाईकोर्ट की विस्तृत सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर पिछले कुछ वर्षों में लगातार विवाद सामने आते रहे हैं। पेपर लीक, अनियमितता, मेरिट सूची पर सवाल और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता जैसे मुद्दों को लेकर अभ्यर्थी लंबे समय से आंदोलन करते रहे हैं।

इसी पृष्ठभूमि में राज्य सरकार ने कई परीक्षाओं की समीक्षा करते हुए उन्हें रद्द करने का निर्णय लिया था। लेकिन अब हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यह मामला न्यायिक प्रक्रिया के अधीन आ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का अंतिम फैसला भविष्य की भर्ती प्रक्रियाओं के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

अब इस मामले में झारखंड सरकार हाईकोर्ट के समक्ष अपना पक्ष रखेगी। अदालत यह तय करेगी कि परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय कानूनी रूप से कितना उचित था और क्या सभी चयनित अभ्यर्थियों के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई संविधान सम्मत है।

यदि कोर्ट सरकार के आदेश को निरस्त कर देती है तो चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति स्थायी रूप से सुरक्षित हो सकती है। वहीं यदि सरकार अपने निर्णय को उचित साबित करती है, तो आगे नई भर्ती प्रक्रिया या अन्य वैकल्पिक व्यवस्था पर भी विचार हो सकता है।

फिलहाल हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश ने सैकड़ों अभ्यर्थियों के भविष्य पर लगे अनिश्चितता के बादलों को कुछ समय के लिए जरूर हटा दिया है।

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