Latehar News : लातेहार के महुआडांड़ प्रखंड के दातुखाड़ गांव में सड़क और पुल की सुविधा नहीं होने से करीब 30 वर्षीय मरीज को ग्रामीणों ने खटिया पर पांच किलोमीटर तक ढोया। रास्ते में उदालखाड़ नदी को दो बार पार करना पड़ा। ग्रामीणों ने सड़क, पुल, बिजली, पेयजल और नियमित स्वास्थ्य सुविधा की मांग की है।
Latehar News : लातेहार जिले के महुआडांड़ प्रखंड के सुदूर दातुखाड़ गांव से सामने आई तस्वीरें ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर सवाल खड़े करती हैं। तबीयत बिगड़ने पर सिम्पल कोरवा को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को करीब पांच किलोमीटर तक खटिया उठाकर चलना पड़ा। रास्ते में उदालखाड़ नदी को दो बार पार करना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में सड़क और पुल नहीं होने के कारण आपात स्थिति में मरीजों को इसी तरह मुख्य सड़क तक पहुंचाया जाता है। इसके अलावा गांव की जलमीनार करीब पांच वर्षों से खराब है और बिजली के खंभे तक नहीं लगे हैं।
Latehar News : किसी गांव तक एंबुलेंस का पहुंचना सामान्य स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा माना जाता है, लेकिन झारखंड के लातेहार जिले के एक सुदूर गांव में आज भी बीमार व्यक्ति को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को खटिया का सहारा लेना पड़ रहा है। महुआडांड़ प्रखंड की परहाटोली पंचायत स्थित दातुखाड़ गांव में सोमवार को ऐसा ही मामला सामने आया, जहां करीब 30 वर्षीय सिम्पल कोरवा की तबीयत बिगड़ने के बाद ग्रामीणों ने उन्हें खटिया पर लिटाकर करीब पांच किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक पहुंचाया।
मरीज को मुख्य सड़क तक पहुंचाने का यह सफर आसान नहीं था। ग्रामीणों को रास्ते में उदालखाड़ नदी को दो बार पार करना पड़ा। इसके बाद मुख्य सड़क पर पहुंचने पर किसी तरह ऑटो की व्यवस्था की गई और मरीज को अस्पताल ले जाया गया। इस घटना ने एक बार फिर सुदूर ग्रामीण इलाकों में सड़क, पुल और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार सिम्पल कोरवा पिछले करीब दो महीने से बवासीर की समस्या से पीड़ित हैं। सोमवार को अचानक दर्द बढ़ने और तबीयत बिगड़ने के बाद परिजनों ने उन्हें अस्पताल ले जाने का फैसला किया। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह थी कि गांव तक वाहन पहुंचने के लिए सड़क ही उपलब्ध नहीं है।
परिजनों ने ग्रामीणों से मदद मांगी। इसके बाद प्रकाश कोरवा, लालसाय कोरवा, सचिन कोरवा, झमनसाय कोरवा, अमित कोरवा और सिमत कोरवा समेत अन्य ग्रामीण आगे आए। मरीज को खटिया पर लिटाया गया और कई ग्रामीणों ने मिलकर उसे कंधे के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाया।
करीब पांच किलोमीटर की दूरी तय करने के दौरान ग्रामीणों को उदालखाड़ नदी को दो बार पार करना पड़ा। मरीज की हालत को देखते हुए यह सफर परिवार और ग्रामीणों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण रहा।
सिम्पल कोरवा की पत्नी सुगीता कोरवाइन का कहना है कि दातुखाड़ गांव तक पक्की सड़क नहीं है। इसके अलावा उदालखाड़ नदी पर पुल की सुविधा भी नहीं है। ऐसे में जब किसी ग्रामीण की तबीयत गंभीर होती है तो उसे खटिया के सहारे मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है।
ग्रामीणों के मुताबिक बरसात के दिनों में स्थिति और ज्यादा कठिन हो जाती है। बारिश के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने से उसे पार करना जोखिम भरा हो जाता है। ऐसे में मरीज को अस्पताल पहुंचाने में देरी होने की आशंका भी बनी रहती है।
यह समस्या सिर्फ एक मरीज या एक परिवार तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की कमी के कारण गांव में किसी भी आपात स्थिति के दौरान सबसे पहले परिवहन की समस्या सामने आती है।
दातुखाड़ गांव में सिर्फ सड़क और पुल की समस्या ही नहीं है। ग्रामीण पेयजल संकट से भी जूझ रहे हैं। ग्रामीणों के अनुसार गांव की जलमीनार करीब पांच वर्षों से खराब पड़ी है। लंबे समय से इसकी मरम्मत नहीं होने के कारण लोगों को पानी के लिए नदी पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं होने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा बना रहता है। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए साफ पानी की उपलब्धता बेहद जरूरी है।
दातुखाड़ में बिजली की सुविधा भी ग्रामीणों के लिए बड़ी समस्या बनी हुई है। ग्रामीणों के अनुसार गांव में अब तक बिजली के खंभे तक नहीं लगाए गए हैं। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है।
मोबाइल फोन चार्ज करने जैसी सामान्य जरूरतों के लिए भी ग्रामीणों को दूसरे स्थानों पर जाना पड़ता है। रात के समय रोशनी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से ग्रामीणों की परेशानी और बढ़ जाती है।
ग्रामीणों के मुताबिक गांव में नियमित स्वास्थ्य शिविर भी नहीं लगता। स्वास्थ्यकर्मियों की पहुंच भी नियमित नहीं होने के कारण सामान्य बीमारी के इलाज के लिए लोगों को दूर जाना पड़ता है।
सड़क की अनुपलब्धता इस समस्या को और गंभीर बना देती है। सामान्य बीमारी में किसी तरह मरीज को बाहर ले जाना संभव हो सकता है, लेकिन गंभीर स्थिति या आपातकाल में हर मिनट महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में पांच किलोमीटर तक खटिया पर मरीज को ढोना और बीच में नदी पार करना परिवार के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है।
दातुखाड़ गांव के अधिकांश परिवार खेती और मजदूरी पर निर्भर बताए जाते हैं। ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण निजी वाहन से मरीज को अस्पताल ले जाना भी हर परिवार के लिए आसान नहीं है।
दूसरी ओर गांव तक वाहन पहुंचने के लिए सड़क नहीं होने के कारण निजी वाहन भी सीधे घर तक नहीं पहुंच सकता। यही वजह है कि बीमारी या आपात स्थिति में ग्रामीणों को पहले मरीज को खटिया पर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है और फिर वहां से वाहन की व्यवस्था करनी पड़ती है।
घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन से दातुखाड़ गांव तक सड़क निर्माण कराने और उदालखाड़ नदी पर पुल या पुलिया बनाने की मांग की है। इसके साथ ही ग्रामीणों ने पांच वर्षों से खराब जलमीनार की मरम्मत, स्वच्छ पेयजल और बिजली की सुविधा उपलब्ध कराने की मांग की है।
ग्रामीणों की मांग है कि गांव में नियमित स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएं और स्वास्थ्यकर्मियों की पहुंच सुनिश्चित की जाए, ताकि सामान्य इलाज के लिए भी लोगों को लंबी दूरी तय न करनी पड़े।
दातुखाड़ की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की परेशानी नहीं, बल्कि उन दूरदराज इलाकों की चुनौती को सामने लाती है जहां सड़क, पुल, बिजली, पेयजल और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं आज भी लोगों की पहुंच से दूर हैं। सवाल यह है कि विकास की योजनाओं के बीच ऐसे गांवों तक बुनियादी सुविधाएं कब पहुंचेंगी, ताकि किसी मरीज को अस्पताल जाने के लिए खटिया को ही एंबुलेंस न बनाना पड़े।















