Jharkhand News : दुमका, लातेहार और साहिबगंज में पत्थर एवं मिट्टी खनन परियोजनाओं को मिली स्वीकृति, पौधारोपण, धूल नियंत्रण, स्वास्थ्य जांच और डिजिटल निगरानी की जिम्मेदारी परियोजना संचालकों पर।
Jharkhand News : झारखंड के दुमका, लातेहार और साहिबगंज में कई पत्थर एवं मिट्टी खनन परियोजनाओं को पर्यावरणीय स्वीकृति और टीओआर की मंजूरी मिली है। जानिए पौधारोपण, श्रमिक सुरक्षा, धूल नियंत्रण और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई से जुड़े नए निर्देश।
Jharkhand News : झारखंड में खनन गतिविधियों को पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप संचालित करने के लिए प्राधिकार ने कई परियोजनाओं को स्वीकृति प्रदान की है। दुमका, लातेहार और साहिबगंज जिले में प्रस्तावित पत्थर एवं मिट्टी खनन परियोजनाओं से संबंधित प्रस्तावों की समीक्षा के बाद अलग-अलग मामलों में पर्यावरणीय स्वीकृति और टर्म्स ऑफ रेफरेंस (टीओआर) को मंजूरी दी गई है। इसके साथ ही परियोजना संचालकों के लिए पौधारोपण, धूल नियंत्रण, श्रमिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा तथा डिजिटल निगरानी से संबंधित कई शर्तें निर्धारित की गई हैं।
प्राधिकार का जोर इस बात पर है कि खनन गतिविधियों के दौरान पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम किया जाए और आसपास रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा का ध्यान रखा जाए। स्वीकृत परियोजनाओं को निर्धारित नियमों और शर्तों का पालन करना होगा।
दुमका जिले के शिकारीपाड़ा थाना क्षेत्र के लोवापारा गांव में मेसर्स लक्ष्मी स्टोन वर्क्स की 1.963 हेक्टेयर भूमि पर प्रस्तावित पत्थर खनन परियोजना को नियमों और शर्तों की समीक्षा के बाद टर्म्स ऑफ रेफरेंस (टीओआर) की स्वीकृति दी गई है।
प्रस्तावित खनन क्षेत्र की वन सीमा से दूरी 912 मीटर होने की पुष्टि के बाद यह निर्णय लिया गया। हालांकि, परियोजना संचालक को आसपास की आबादी के संरक्षण के लिए विशेष व्यवस्था करनी होगी।
निर्देश के अनुसार, प्रस्तावित परियोजना की सीमा से 500 मीटर के दायरे में रहने वाले लोगों को ध्यान में रखते हुए विस्तृत पर्यावरण प्रबंधन योजना तैयार करनी होगी। इस योजना को पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) रिपोर्ट में शामिल करना अनिवार्य होगा।
इसका उद्देश्य खनन से उत्पन्न होने वाली धूल, शोर और अन्य संभावित पर्यावरणीय प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए पहले से आवश्यक उपाय निर्धारित करना है। टीओआर की मंजूरी को अंतिम पर्यावरणीय स्वीकृति के समान नहीं माना जाना चाहिए। परियोजना को आगे की प्रक्रिया में निर्धारित आवश्यकताओं का पालन करना होगा।
लातेहार जिले के चंदवा थाना क्षेत्र स्थित लतदाग मौजा में मेसर्स टॉप ब्रिक्स की 0.32 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रस्तावित ईंट मिट्टी खनन परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति प्रदान की गई है।
ईंट निर्माण के लिए मिट्टी की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है, लेकिन इसके लिए होने वाली खुदाई का आसपास की जमीन, जल निकासी और पर्यावरण पर प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में परियोजना संचालक को मंजूरी के साथ निर्धारित पर्यावरणीय शर्तों का पालन करना होगा।
खनन गतिविधियों के दौरान मिट्टी के कटाव, धूल के फैलाव और आसपास के क्षेत्र में होने वाले संभावित प्रभावों को नियंत्रित करना महत्वपूर्ण रहेगा। स्वीकृति की शर्तों के अनुपालन की जिम्मेदारी संबंधित परियोजना संचालक की होगी।
साहिबगंज जिले के बरहरवा, कोटलपोखर और आसपास के क्षेत्रों में चार प्रमुख मिट्टी खनन परियोजनाओं को भी स्वीकृति मिली है। इनमें मेसर्स किसान ब्रिक्स फील्ड, मेसर्स सोनी ब्रिक्स फील्ड, मेसर्स जय जवान और मेसर्स डायमंड ब्रिक्स शामिल हैं।
इन परियोजनाओं का संबंध ईंट निर्माण के लिए मिट्टी की उपलब्धता से है। खनन गतिविधियों के दौरान पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना, निर्धारित क्षेत्र के भीतर ही खुदाई करना और आसपास के लोगों को संभावित परेशानियों से बचाना आवश्यक होगा।
साहिबगंज जिले के मांडरो अंचल स्थित पकारिया गांव में मेसर्स जय मां तारा स्टोन वर्क्स की 2.934 हेक्टेयर क्षेत्र में प्रस्तावित पत्थर खनन परियोजना को भी मंजूरी प्रदान की गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह परियोजना वन सीमा से 400 मीटर से अधिक दूरी पर स्थित है।
इन स्वीकृतियों के साथ संबंधित संचालकों पर पर्यावरण संरक्षण के मानकों को लागू करने और खनन कार्य को निर्धारित शर्तों के अनुसार संचालित करने की जिम्मेदारी होगी।
खनन परियोजनाओं के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने के लिए प्राधिकार ने पौधारोपण और हरित क्षेत्र के विस्तार पर विशेष जोर दिया है।
निर्देशों के अनुसार, परियोजना के कुल प्रस्तावित हरित क्षेत्र का 10 प्रतिशत हिस्सा ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के लिए आरक्षित रखना होगा। परियोजना संचालकों को पौधारोपण से संबंधित संपूर्ण डेटा ‘मेरी लाइफ’ पोर्टल पर अपलोड करना होगा।
इसके अतिरिक्त, खदान के सुरक्षा क्षेत्र के लिए निर्धारित पौधारोपण क्षेत्रफल से दोगुने क्षेत्र में पौधे लगाने का निर्देश दिया गया है। इसके लिए खदान के आसपास उपलब्ध बाहरी भूमि का उपयोग किया जाएगा। लगाए जाने वाले पौधों की ऊंचाई कम से कम दो मीटर होनी चाहिए और उनका चयन स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल उपयुक्त प्रजातियों के आधार पर किया जाना होगा।
पौधारोपण केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए, इसके लिए नए लगाए गए पौधों का कम से कम तीन वर्षों तक उचित रखरखाव करना होगा। परियोजना संचालकों को समय-समय पर जियो-टैग की गई तस्वीरों के साथ प्रगति रिपोर्ट प्राधिकार को सौंपनी होगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य पौधारोपण की वास्तविक स्थिति की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि लगाए गए पौधे जीवित रहें तथा हरित क्षेत्र के विस्तार में योगदान दें।
पत्थर और मिट्टी के खनन के दौरान उड़ने वाली धूल आसपास के वातावरण और स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। इसे नियंत्रित करने के लिए प्राधिकार ने सभी संबंधित परियोजनाओं के संचालकों को समर्पित वाटर टैंकर रखने का निर्देश दिया है।
इस टैंकर का इस्तेमाल केवल खनन क्षेत्र की सड़कों पर पानी का छिड़काव करके धूल को नियंत्रित करने और नए लगाए गए पौधों की सिंचाई के लिए किया जाएगा। खनन क्षेत्र की सड़कों को नियमित रूप से नम रखना भी अनिवार्य किया गया है।
धूल नियंत्रण के इन उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन खनन क्षेत्र के आसपास रहने वाले लोगों, श्रमिकों और पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि परियोजना संचालक इन निर्देशों का पालन कितनी नियमितता और गंभीरता से करते हैं।
खनन कार्य में लगे कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर भी प्राधिकार ने सख्त निर्देश दिए हैं। सभी श्रमिकों को 3एम मेक या उसके समकक्ष गुणवत्ता वाले सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराने होंगे। इनमें हेलमेट, सुरक्षात्मक चश्मे और विशेष सुरक्षा कपड़े शामिल हैं।
इसके अलावा, खनन कार्य शुरू होने से पहले प्रत्येक कर्मचारी का स्वास्थ्य परीक्षण कराना होगा। इसके बाद हर वर्ष स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था भी अनिवार्य की गई है, ताकि कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की समय रहते पहचान की जा सके।
खदान के जोखिम वाले संवेदनशील हिस्सों को मानवरहित रखने और कर्मचारियों की ड्यूटी रोटेशन प्रणाली के आधार पर निर्धारित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। इन उपायों का उद्देश्य कार्यस्थल पर दुर्घटनाओं की आशंका कम करना और कर्मचारियों को अनावश्यक जोखिम से बचाना है।
सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता के साथ उनका सही इस्तेमाल, नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और जोखिम वाले क्षेत्रों की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।
प्राधिकार ने झारखंड उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हरित क्षेत्र के विस्तार, श्रमिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा और डिजिटल निगरानी को अनिवार्य बनाया है।
निर्धारित शर्तों का उल्लंघन होने पर संबंधित परियोजना की स्वीकृति तत्काल प्रभाव से रद्द किए जाने की चेतावनी दी गई है। इस सख्त रुख का उद्देश्य खनन गतिविधियों को पर्यावरणीय नियमों के दायरे में रखना और संचालकों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
हालांकि, इन निर्देशों की सफलता केवल मंजूरी देने तक सीमित नहीं है। इसके लिए नियमित निरीक्षण, पौधारोपण की वास्तविक स्थिति की जांच, धूल नियंत्रण के उपायों की निगरानी और श्रमिकों की सुरक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन भी जरूरी होगा।









