Jamshedpur News : करीब 11 लाख रुपये की लागत से तैयार हुआ भव्य पूजा पंडाल, प्लास्टिक और थर्माकोल से दूरी बनाकर पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश
Jamshedpur News : झारखंड के जमशेदपुर स्थित जादूगोड़ा में इस बार दुर्गा पूजा के लिए खास इको-फ्रेंडली पंडाल बनाया गया है। मिट्टी, बांस, मिट्टी के बर्तनों और पारंपरिक सामग्रियों से सजे इस पंडाल में पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर की प्रसिद्ध टेराकोटा कला की झलक देखने को मिल रही है। लगभग 11 लाख रुपये की लागत से बंगाल के कारीगरों ने दो महीने की मेहनत से इसे तैयार किया है।
Jamshedpur News : दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आस्था और परंपरा का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय कला, संस्कृति और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। हर साल पूजा के दौरान अलग-अलग थीम पर आधारित भव्य पंडाल लोगों के आकर्षण का केंद्र बनते हैं। कहीं ऐतिहासिक धरोहरों की झलक देखने को मिलती है, तो कहीं आधुनिक तकनीक के जरिए अनोखी कलाकृतियां तैयार की जाती हैं। लेकिन जमशेदपुर के जादूगोड़ा में इस बार एक ऐसा दुर्गा पूजा पंडाल तैयार किया गया है, जो अपनी सादगी, पारंपरिक कला और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी के कारण खास चर्चा में है।
यहां बनाया गया इको-फ्रेंडली दुर्गा पूजा पंडाल पूरी तरह मिट्टी और बांस जैसी पारंपरिक सामग्रियों पर आधारित है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पंडाल के निर्माण में प्लास्टिक और थर्माकोल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। आज जब त्योहारों के दौरान सजावट के लिए बड़ी मात्रा में प्लास्टिक और अन्य गैर-जैविक सामग्रियों का उपयोग किया जाता है, ऐसे में जादूगोड़ा का यह प्रयास पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक संदेश देता है।
इस पूजा पंडाल की थीम पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर की प्रसिद्ध टेराकोटा कला से प्रेरित है। टेराकोटा यानी पकी हुई मिट्टी से बनाई जाने वाली कलात्मक आकृतियां भारतीय लोककला और पारंपरिक शिल्प की महत्वपूर्ण पहचान हैं। इस कला में मिट्टी को आकार देकर विभिन्न आकृतियां तैयार की जाती हैं और फिर उन्हें पकाकर मजबूत बनाया जाता है।
जादूगोड़ा के पंडाल में इस पारंपरिक कला को आधुनिक पंडाल निर्माण की अवधारणा के साथ जोड़ने का प्रयास किया गया है। यहां इस्तेमाल की गई सामग्री और सजावट ग्रामीण जीवन, स्थानीय शिल्प तथा भारतीय सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाती है।
पंडाल की सजावट में मिट्टी के बर्तन, बांस के सूप और अन्य पारंपरिक वस्तुओं का इस्तेमाल किया गया है। इन सामग्रियों के माध्यम से ग्रामीण जीवन की सहजता और लोककला की खूबसूरती को उभारने की कोशिश की गई है। पंडाल की पूरी अवधारणा इस बात को सामने लाती है कि प्राकृतिक और पारंपरिक संसाधनों का इस्तेमाल करके भी आकर्षक तथा भव्य सजावट की जा सकती है।
जादूगोड़ा के इस विशेष दुर्गा पूजा पंडाल को तैयार करने में लगभग 11 लाख रुपये की लागत आई है। इसे पश्चिम बंगाल से आए कारीगरों ने अपनी मेहनत और कलात्मक कौशल से तैयार किया है। जानकारी के अनुसार, पंडाल के निर्माण में करीब दो महीने का समय लगा।
मिट्टी और बांस जैसी सामग्रियों से किसी बड़े पूजा पंडाल को तैयार करना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण काम है। इसके लिए सामग्री के चयन, संरचना की मजबूती, सजावट के संतुलन और पारंपरिक कला की बारीकियों पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। ऐसे निर्माण में कारीगरों का अनुभव और तकनीकी दक्षता महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
करीब दो महीने तक चली इस प्रक्रिया में बंगाल के कारीगरों ने पारंपरिक शिल्पकला को पंडाल के स्वरूप में ढालने का प्रयास किया। लगभग 11 लाख रुपये का बजट इस बात को भी दर्शाता है कि पूजा आयोजन में केवल चमक-दमक ही नहीं, बल्कि एक विशेष कलात्मक अवधारणा और उसके क्रियान्वयन को भी महत्व दिया गया है।
आज त्योहारों और बड़े सार्वजनिक आयोजनों के बाद निकलने वाला कचरा एक गंभीर चुनौती बन जाता है। प्लास्टिक, थर्माकोल और अन्य गैर-जैविक सजावटी सामग्रियों का उचित निपटान नहीं होने पर वे पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकती हैं। नालियों में जमा कचरा, मिट्टी और जल स्रोतों पर पड़ने वाला प्रभाव तथा सफाई व्यवस्था पर बढ़ता दबाव कई जगहों पर चिंता का विषय है।
ऐसे समय में इको-फ्रेंडली पूजा पंडाल की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। जादूगोड़ा में मिट्टी और बांस जैसी सामग्रियों को प्राथमिकता देकर आयोजकों ने एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। यह पहल दूसरे पूजा आयोजकों को भी सजावट के लिए पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाने की प्रेरणा दे सकती है।

हालांकि किसी भी पंडाल को पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए केवल निर्माण सामग्री ही नहीं, बल्कि बिजली की खपत, कचरा प्रबंधन, प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले रंगों और पूजा के बाद सामग्री के निपटान पर भी ध्यान देना जरूरी है। यदि इन सभी पहलुओं को शामिल किया जाए, तो ऐसे प्रयासों का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव और अधिक बढ़ सकता है।
इस पंडाल की एक अन्य खासियत पारंपरिक कारीगरों की कला को सार्वजनिक मंच प्रदान करना है। आधुनिक सजावट और तैयार सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल के बीच मिट्टी, बांस तथा अन्य पारंपरिक शिल्पों पर आधारित काम को प्रोत्साहन मिलना स्थानीय और पारंपरिक कला के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण है।
पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर की टेराकोटा कला से प्रेरित यह पंडाल झारखंड और बंगाल के सांस्कृतिक जुड़ाव की भी झलक पेश करता है। दोनों क्षेत्रों के बीच लंबे समय से सामाजिक, सांस्कृतिक और कलात्मक संबंध रहे हैं। दुर्गा पूजा जैसे त्योहार इन संबंधों को और मजबूत करने का अवसर प्रदान करते हैं।
ऐसे आयोजन यह भी दिखाते हैं कि पारंपरिक कला केवल संग्रहालयों या ऐतिहासिक इमारतों तक सीमित नहीं है। इसे समकालीन आयोजनों में भी जगह दी जा सकती है। इससे लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझने का अवसर मिलता है और कारीगरों की मेहनत को पहचान मिल सकती है।
पंडाल से जुड़े सदस्य सुशील अग्रवाल, जिन्हें बुलु गंजी के नाम से भी जाना जाता है, और पूजा समिति के अध्यक्ष अमित साहू ने इस आयोजन से संबंधित जानकारी साझा की। पंडाल की थीम, निर्माण में इस्तेमाल की गई सामग्री और इसे तैयार करने में लगे समय तथा लागत की जानकारी इस आयोजन की विशेषताओं को सामने लाती है।
पंडाल का उद्देश्य केवल आकर्षक सजावट प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि पारंपरिक कला और प्राकृतिक सामग्रियों के महत्व को भी रेखांकित करना है। मिट्टी और बांस के इस्तेमाल से तैयार इस संरचना के जरिए लोगों को यह संदेश मिलता है कि धार्मिक आयोजनों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी के साथ भी मनाया जा सकता है।
जादूगोड़ा का यह इको-फ्रेंडली दुर्गा पूजा पंडाल धार्मिक आस्था, पारंपरिक लोककला और पर्यावरण के प्रति जागरूकता को एक साथ जोड़ने का प्रयास है। लगभग 11 लाख रुपये की लागत और दो महीने की मेहनत से तैयार इस पंडाल में बंगाल की टेराकोटा कला से प्रेरित सजावट इसकी विशिष्ट पहचान बनाती है।
दुर्गा पूजा जैसे बड़े उत्सवों में भव्यता के साथ जिम्मेदारी को भी महत्व देना समय की जरूरत है। यदि पूजा समितियां स्थानीय कारीगरों को अवसर दें, प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल बढ़ाएं और कचरा प्रबंधन पर ध्यान दें, तो त्योहारों की सुंदरता के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल सकता है।
जादूगोड़ा का यह प्रयास इसी दिशा में एक उल्लेखनीय पहल है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले वर्षों में ऐसे पर्यावरण अनुकूल पंडालों की अवधारणा कितनी व्यापक होती है और दूसरे आयोजन भी इससे क्या प्रेरणा लेते हैं।













